
मेने मार दिया अपने अन्दर के इन्सान को
पत्थर में बसे भगवन को ...
उठा रखा हे सारे शहर का जिम्मा ,
पर नहीं पता कैसी होगी मेरी माँ...
बच्चो के लिए चाचा नेहरु बन जाता हूँ ,
मगर अपने बच्चो को कभी वक़्त नहीं दे पता हूँ ...
खबर है मुझे पूरी दुनिया की ,
कौन हे मेरा पडोसी इससे में अंजाना हूँ ...
में घूमा हूँ मंदिरों... मस्जिदों... गुरुद्वारों में ,
कौन रहता है मेरे दिल में अब तक नहीं जाना हूँ ...
गला घोट दिया मैंने अपनी भावनाओ का ,
क्या इन्सान ए़से होते हे ? ... मुझे देख अक्सर लोग यही कहते हैं !!
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