Wednesday, October 21, 2009

कुंआरीसाँसों का व्रत तोड़ दो


प्यार को प्यार से यूँ एक हसीन मोड़ दो
आज रात मेरे जिस्म में रूह अपनी छोड़ दो !
परवाह न करो,मान लो इकरार की मेरी जि़द
हर रस्म और हर कसम आज सब तोड़ दो !
फिर मिले न मिले क्या भरोसा ओ मेरे पिया
बदन में कोई निशानी मेरे आज तुम छोड़ दो !
जितने प्यासे हो तुम उतने ही प्यासे हें हम
कोरी चादर पे आज कोई सिन्दूरी रंग छोड़ दो !
तन मन और जीवन सब तुम्हारे हवाले हें अब
सोलह सावन की कुंआरीसाँसों का व्रत तोड़ दो !
दो बदन मिले यूँ दरमियाँ साँसों का फासला न हो
आगोश में छुपा लो, जिस्म दो मगर रूह जोड़ दो
झुमके- कंगन, चूड़ी पायल सबतो जेवर हें बस
अनमोल गहना तो नथ है लो इसे भी तोड़ दो
सजन तुम्हारी वासना मेरी जन्मो की है उपासना
स्वीकार कर के मुझे प्रेम की समाधि से जोड़ दो !!

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